कोटा में प्रसूताओं की किडनी फेल होकर मौत होने के मामले में सभी की निगाहें दवाइयों और इंजेक्शन की जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है। इसी बीच दैनिक भास्कर की पड़ताल में मेडिकल कॉलेज में स्थानीय स्तर पर खरीदी दवाइयों और इंजेक्शन में एक बाहरी इंजेक्शन होने के पुख्ता सबूत मिले हैं। अस्पताल में इस कंपनी के 4 हजार इंजेक्शन सप्लाई हुए थे।
बिना अप्रुवल इंजेक्शन खरीदे
यह इंजेक्शन मेडिकल कॉलेज के रेट कॉन्ट्रेट में अप्रूव नहीं हैं। नियमानुसार इस इंजेक्शन को किसी भी हाल में न खरीद सकते हैं और न ही मरीजों को लगा सकते हैं। इस मामले में अस्पताल प्रबंधन संदेह के घेरे में है। दैनिक भास्कर ने इस गड़बड़ी को उजागर करने के लिए लगातार 9 दिन तक पड़ताल करके तथ्य जुटाए।इसके बाद पूरा फर्जीवाड़ा सामने आ गया। 33 तरह की दवाइयों के सैंपल कोलकाता और जयपुर भेजे हुए हैं। इनके सैंपल की रिपोर्ट 23-24 मई तक आने की संभावना है।
फिलहाल पूरे देश में इन दवाओं के उपयोग पर रोक लगाई हुई है। यह इंजेक्शन अस्पताल में कैसे और किसके इशारे पर पहुंचे, यह जांच का विषय है। ड्रग विभाग को स्टोर में चौथी कंपनी का इंजेक्शन मिला, जिसके उन्होंने सैंपल लिए। जब प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ी तो 7 मई को ड्रग विभाग, जयपुर की टीम मेडिकल कॉलेज पहुंची।
टीम ने गायनी विभाग के पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड-1 से अलग-अलग दवाइयों और इंजेक्शन के सैंपल लिए। इनमें एक दर्द निवारक डायक्लोफिनेक सोडियम इंजेक्शन का सैंपल भी था। इसका ब्रांड नेम Diclodeer और बैच नंबर DC225077 था।
इसकी मैनुफेक्चरिंग कंपनी का नाम ड्यूफूल हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड है, जो जयपुर जिले की आमेर तहसील के बेनार गांव की है। यह दवा अस्पताल प्रबंधन ने मेडिकल कॉलेज की रेट कॉन्ट्रेक्ट वाली कोटा की फर्म स्नेहा मेडिकोज से मंगवाई। इस इंजेक्शन के सैंपल की पूरी जानकारी ड्रग विभाग की नोटिंग में है।
स्टोर इंचार्ज ने कहा कि अधीक्षक ने कहा था
ड्रग स्टोर इंचार्ज वीना कुमारी ने कहा कि उस समय आपातकालीन स्थिति थी। सप्लायर के पास स्वीकृत तीन कंपनियों का स्टॉक नहीं था, इसलिए इमरजेंसी में दूसरी कंपनी का माल लेना पड़ा।
अधीक्षक सर को सूचित किया था कि रजिस्टर्ड कंपनी का माल उपलब्ध नहीं है। सर के कहने पर ही सप्लायर से एक स्पष्टीकरण पत्र लेकर यह माल खरीदा था। यह खरीद 24 अप्रैल को की थी और कुल मात्रा लगभग 4000 इंजेक्शन थी। यह माल आधिकारिक पीओ जनरेट होने के बाद ही सिस्टम के जरिए आया है।
अधीक्षक बोले- रेट कंट्रेक्ट के बिना दवा नहीं खरीदते
अस्पताल अधीक्षक आशुतोष शर्मा ने कहा कि हम रेट कांट्रेक्ट के आधार पर ही ऑर्डर देते हैं। आप ऑर्डर देख लीजिए, मैंने क्या ऑर्डर दिया। कोई मेरे लिए कह रहा है कि मैंने बिना रेट कांट्रेक्ट वाली दवा खरीदने को कहा तो यह गलत है।
आरोप कोई भी लगा सकता है। मेडिकल कॉलेज स्तर पर रेट कांट्रेक्ट किया जाता है, ताकि जयपुर से राज्य सरकार की सरकारी सप्लाई नहीं मिलने पर मरीजों के लिए और तत्काल दवा मंगा सके। इसमें कंपनी तय होती है, ताकि अच्छी क्वालिटी और रेट के अनुरूप दवा मिले।
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