TONK // “आत्मा के रोगों का वैद्य है धर्म” – टोंक में बोले आचार्य वर्धमान सागर महाराज
टोंक में सुख और दुख कितने प्रकार का होता है? सुख किन कार्यों से मिलता है? दुख किन कार्यों से होता है,? पुण्य और पाप किस कारण होता है,? हार और जीत से क्या मिलता है? ,जीत कर भी दुख क्यों होता है? आज का व्यक्ति किस कारण से दुखी है? इन सब की विवेचना आचार्य वर्धमान सागर महाराज ने अपने धर्म देशना में टोंक नगर में की।

संसार में शब्द अनेक है कुछ शब्दों से सुख मिलता है। प्रिय लगते हैं और कुछ शब्दों से चिंता और पीड़ा होती है।आचार्य श्री ने बाहुबली ओर चक्रवती भरत की कहानी और मल्य , दृष्टि ओर जलयुद्ध में भरत ने पराजित होने पर बाहुबली पर चक्र चला दिया चक्र भी बाहुबली की परिक्रमा लगाकर वापस लौट गया। बाहुबली जीत कर भी इस कारण दुखी हुए और उन्होंने वैराग्य के वशीभूत होकर दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली।

शरीर का रोग वैद्य डॉक्टर दूर करता हैं किंतु आत्मा के विषयभोग ,राग द्वेष ,कर्मों सात व्यसन के रोग योगी आचार्य साधु परमेष्ठि धर्म रूपी अमृत औषधि से दूर करते हैं धर्म से सिद्ध बनने की राह मिलती हैं।
टोंक से अशोक शर्मा की रिपोर्ट
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