राजस्थान के 10 हजार शिक्षकों के प्रमोशन का रास्ता साफ:सीनियर टीचर को राहत बरकरार, हाईकोर्ट ने एक साथ खारिज की 28 याचिकाएं

राजस्थान हाईकोर्ट (जोधपुर मुख्यपीठ) ने शिक्षा विभाग के सेवा नियमों में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली 28 याचिकाओं को एक साथ खारिज करते हुए फैसला सुनाया है। इस फैसले से कॉमर्स, म्यूजिक, कृषि, चित्रकला (ड्राइंग) और गृह विज्ञान (होम साइंस) जैसे सब्जेक्ट के करीब 10 हजार सीनियर टीचर (जनरल) के प्रमोशन पर लगी रोक हट गई है।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने फैसले में राजस्थान शैक्षिक (राज्य एवं अधीनस्थ) सेवा (प्रथम संशोधन) नियम 2024 की वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा हैकोर्ट ने पाया कि 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत 10+2+3 प्रणाली लागू हुई थी। इससे कक्षा 9वीं और 10वीं में स्पेशल सब्जेक्ट (जैसे- वाणिज्य, कृषि, ड्राइंग) की जरूरत लगभग खत्म हो गई। इसके बद इन सब्जेक्ट को पढ़ाने वाले शिक्षक सालों तक एक ही पद पर रहे।

जुलाई 2021 में जब नए शैक्षिक सेवा नियम लागू हुए तो इन सीनियर टीचर (जनरल) के प्रमोशन के बचे-कुचे अवसर भी समाप्त हो गए। पदों को 100 प्रतिशत सीधी भर्ती से भरने का प्रावधान कर दिया गया।

इन 10 हजार शिक्षकों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने 7 फरवरी 2024 को एक अधिसूचना जारी कर नियमों में प्रथम संशोधन किया। इस संशोधन के जरिए 50 प्रतिशत पदोन्नति का चैनल केवल ‘सीनियर टीचर (जनरल)’ के लिए आरक्षित कर दिया गया।

इसी अधिसूचना को उन सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट (विषय विशेषज्ञ) ‘सीनियर टीचर्स’ ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिन्होंने अपनी नियुक्ति के बाद किसी अलग सब्जेक्ट में पोस्ट-ग्रेजुएशन (पीजी) कर लिया था। उनका दावा था कि इस संशोधन और 3 अगस्त 2021 की कट-ऑफ डेट के कारण लेक्चरर पद पर उनके प्रमोशन के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो गए हैं।

दलीलें: मौलिक अधिकार का दावा v/s सरकार का ‘वन-टाइम रिलीफ’

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि प्रमोशन के लिए विचार किया जाना एक मौलिक अधिकार है। सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट सीनियर टीचर और जनरल टीचर के बीच किया गया यह वर्गीकरण पूरी तरह गलत है। नियम संशोधन के जरिए उनके प्रमोशन के अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

इसके जवाब में राज्य सरकार के वकीलों ने संशोधन का बचाव करते हुए कोर्ट में एक बड़ा खुलासा किया। सरकार ने बताया कि 2024 का यह संशोधन कोई स्थायी नियम नहीं है, बल्कि एक ‘अस्थायी व्यवस्था’ या ‘वन-टाइम रिलीफ’ है। यह संशोधन केवल वर्तमान में कार्यरत उन 10 हजार ‘सीनियर टीचर (जनरल)’ का बैकलॉग खत्म करने के लिए लाया गया है, जो साल 2021 के नियमों से पीड़ित थे।

सरकार ने स्पष्ट किया कि जैसे ही इन शिक्षकों का प्रमोशन पूरा हो जाएगा, उसके बाद भविष्य में इन पदों पर 100 प्रतिशत सीधी भर्ती ही की जाएगी।

हाईकोर्ट: ‘वैध अपेक्षा’ पर तल्ख टिप्पणी और नजीरों का हवाला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने नियमों का विश्लेषण कर याचिकाकर्ताओं के इस दावे को तथ्यों के साथ खारिज कर दिया कि उनके प्रमोशन के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘लेक्चरर (अन्य विषय)’ के पद पर 50 प्रतिशत प्रमोशन कोटा अभी भी मौजूद है।

यदि किसी शिक्षक के पास संबंधित विषय में पीजी डिग्री और पांच साल का अनुभव है तो वह वहां से प्रमोशन ले सकता है। इसके अलावा हेडमास्टर और अतिरिक्त ब्लॉक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी के पदों पर भी उनके लिए विकल्प खुले हैं।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ‘वैध अपेक्षा’ की दलील पर ‘सिवानंदन सी.टी. बनाम केरल हाईकोर्ट’ (2023) मामले का हवाला देते हुए तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा- सिर्फ नौकरी के दौरान अपनी मर्जी से कोई अतिरिक्त डिग्री (पीजी) हासिल कर लेने मात्र से किसी कर्मचारी का प्रमोशन पाने का कोई मौलिक अधिकार या वैध अपेक्षा पैदा नहीं हो जाती।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘शायरा बानो बनाम भारत संघ’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी कानून तभी रद्द किया जा सकता है. जब वह स्पष्ट रूप से मनमाना हो।

वहीं ‘त्रिलोकी नाथ खोसा’ (1974) मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक योग्यता के आधार पर कर्मचारियों का वर्गीकरण करना और कट-ऑफ डेट तय करना पूरी तरह से नियोक्ता का नीतिगत फैसला है। ‘एयर कमोडोर नवीन जैन’ केस का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि पदोन्नति का दावा कोई मौलिक अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने माना कि 3 अगस्त 2021 की कट-ऑफ डेट तार्किक है, क्योंकि इसी दिन 2021 के नए नियम लागू हुए थे। इन विस्तृत आधारों पर कोर्ट ने संशोधन को वैध मानते हुए सभी 28 याचिकाएं खारिज कर दीं।

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