TONK // 88 वर्षीय मुनि श्री चिन्मय सागर जी ने संयम साधना में मांगा संस्तरारोहण, आचार्य वर्धमान सागर जी ने दी मार्गदर्शना

वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी इन दिनों संघ सहित श्री आदिनाथ जिनालय नसिया, टोंक में विराजमान हैं। प्रसिद्ध भामाशाह श्री अशोक जी पाटनी (आर के मार्बल ग्रुप) ने दर्शन हेतु टोंक आगमन किया। गुरुवार को मुनि श्री चिन्मय सागर जी को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने संयम साधना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संयम, चारित्र और दीक्षा व्रत की रक्षा करनी है। जीवन का सार चारित्र में है और प्रमाद व आलस्य से दूर रहना चाहिए।

मुनि श्री को संबल देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि संयम युद्ध के समान है, जिसमें कर्म रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनी है। जीवन का लक्ष्य समाधि रूपी विशुद्धता होना चाहिए। 88 वर्षीय मुनि श्री चिन्मय सागर जी ने आचार्य श्री अजित सागर जी से वर्ष 1989 में दीक्षा ली थी। अब उन्होंने संस्तरारोहण का निवेदन करते हुए कहा कि उनका शरीर संयम साधना में बाधक बन रहा है।

संघ के समक्ष उन्होंने क्षमा याचना करते हुए कहा कि अब उन्हें गुरु सानिध्य में सम्यक समाधि का मार्ग प्रदान किया जाए। आचार्य श्री ने मंत्रोच्चार से कक्ष की शुद्धि की और सभी साधकों ने मुनि श्री से क्षमा याचना की। संस्तरारोहण का अर्थ है – उस स्थान पर बैठना, लेटना जिसे संस्तर कहा जाता है।
मुनि श्री अब क्रमपूर्वक आहार त्याग की प्रक्रिया में हैं। वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का नवधा भक्ति पूर्वक आहार आज तारा अम्मा के यहां हुआ।इस अवसर पर किशनगढ़ से प्रसिद्ध भामाशाह अशोक जी पाटनी हेलीकॉप्टर से टोंक पहुंचे। हेलीपैड पर आचार्य वर्धमान वर्षायोग समिति के पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया। स्थानीय समाज के प्रमुखों में भागचंद फूलेता, महावीर प्रसाद देवली, संजय संघी, कमल सर्राफ, नीटू छामुनिया, विनायक कल्ली आदि उपस्थित रहे।
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टोंक से अशोक शर्मा की रिपोर्ट
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